भारत में प्राच्यवादी :–
18वीं और 19वीं सदी में, यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका के विद्वानों ने भारत की संस्कृतियों और धर्मों का अध्ययन किया। उन्हें "ओरिएंटलिस्ट" कहा जाता था। भारत में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय संस्कृति और भाषाओं के अध्ययन को प्रोत्साहित किया। विद्वानों ने भारतीय साहित्य, इतिहास और भाषा के बारे में महत्वपूर्ण खोजें कीं। हालाँकि, कुछ लोगों ने ओरिएंटलिस्ट विद्वानों की आलोचना की क्योंकि वे केवल प्राचीन ग्रंथों पर ध्यान केंद्रित करते हैं और आधुनिक भारतीय समाज और संस्कृति की अवहेलना करते हैं। लेकिन आज, लोग प्राच्यवादी दृष्टिकोण की सीमाओं और पूर्वाग्रहों के बारे में अधिक जागरूक हो रहे हैं। लेकिन आज वे भारत और इसकी संस्कृति के अध्ययन के लिए एक विविध और समावेशी दृष्टिकोण रखते हैं।